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सबके प्रिय बॉस और सहृदय व्यक्तित्व स्व. एल.के. जोशी, आय.ए.एस. (1970)

**आदरांजलि**

सबके प्रिय बॉस और सहृदय व्यक्तित्व स्व. एल.के. जोशी, आय.ए.एस. (1970)

आज प्रात: वरिष्ठ आय.ए.एस. अफसर श्री एल.के. जोशी के स्वर्गवास का समाचार जानकर मन को काफी दु:ख पहुंचा। उनसे पूर्व वर्षों में भेंट की स्मृतियां ताजा हो गईं। करीब ढाई वर्ष से जनसंपर्क आयुक्त और सचिव के रूप में मैंने अपने कार्यकाल में जनसम्पर्क विभाग के कई अधिकारियों और वरिष्ठ पत्रकारों से उनकी कार्यशैली की प्रशंसा सुनी है। अक्सर ही चर्चाओं में उनका उल्लेख किया जाता है। तीन अवसरों पर वे जनसम्पर्क विभाग के प्रमुख की हैसियत से कार्यरत रहे। वर्ष 1986 से 2002 के मध्य वे जनसम्पर्क में अलग-अलग पदों पर कार्यरत रहे। उनके कार्यकाल में अनेक अच्छी परम्पराएं भी प्रारंभ और स्थापित हुईं। इस नाते उन्हें मध्यप्रदेश जनसम्पर्क का भीष्म पितामह कहा जाये तो गलत न होगा।

मीडिया तक उनकी पहुंच और प्रेस से आत्मीय संबंधों का जिक्र होता रहता है। उनकी संपर्क क्षमता के बारे में प्राय: जनसम्पर्क अधिकारियों और पत्रकारों द्वारा जिक्र किया जाता है। वरिष्ठ पत्रकारों से बातचीत में उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं की जानकारी भी प्राप्त होती है। एक प्रबुद्ध और शिक्षित परिवार से आने वाले स्व. जोशी की पत्नी  डॉ. रेखा जोशी ने किसी समय उनसे एक वर्ष वरिष्ठ होने के कारण पढ़ाया भी था। बनारस विश्वविद्यालय में प्रीवियस और फाईनल ईयर के विद्यार्थी के रूप में जोशी दम्पति के जीवन में यह संयोग हुआ था। यह भी एक तथ्य है कि श्री जोशी की पत्नी जो विवाह के पूर्व  डॉ. रेखा मिश्र थीं, भारत की पहली चयनित महिला आय.पी.एस. अफसर रही हैं। हालांकि उनके पदभार ग्रहण न करने और इतिहास में रूचि के कारण शिक्षा जगत में ही कार्य करने के निर्णय के कारण प्रथम महिला आय.पी.एस अफसर का खिताब सुश्री किरण बेदी को जाता है। नई दिल्ली में सेवानिवृत्ति के बाद बस गये श्री जोशी जीवन के आखिरी तक पत्नी और बेटे-बेटी के साथ कैंसर की तकलीफ के बाद भी प्रसन्न रहे। वे नव वर्ष और दीपावली के साथ ही अन्य अवसरों पर उन्हें  मोबाइल पर भेजे गये सभी संदेशों का उत्तर भी देते थे। 

भोपाल में श्री जोशी की दिनचर्या के बारे में यह सर्वज्ञात है कि वे अल सुबह दफ्तर पहुंच जाते थे। अपने कार्यालय कक्ष में ही चाय पीने के बाद फोन पर और व्यक्तिगत रूप से वरिष्ठ पत्रकारों से चर्चा एवं भेंट करते थे। इस चर्चा और भेंट के सत्र में वे उस दिन छपे अखबारों से आगे की स्थितियों-परिस्थितियों का अनुमान लगा लेते थे। संभवत: उनकी यह विशिष्ट कार्यशैली उनकी सफलता का बहुत बड़ा आधार भी बनी। आज तो मीडिया के अनेक आयाम विद्यमान हैं। करीब दो दशक पहले सिर्फ प्रिंट मीडिया के सहारे शासन-प्रशासन की छवि के निर्माण का कार्य होता था। इसमें कुछ सहयोग सिनेमा प्रदर्शनों और चित्र प्रदर्शनियों का भी होता था। इन सभी माध्यमों का अपने दौर में दक्षता से पूरा उपयोग अपनी विभागीय टीम से करवाने में श्री जोशी पूर्णत: सफल रहे। जनसम्पर्क विभाग की मासिक पत्रिका मध्यप्रदेश संदेश के पूर्व प्रकाशन जयाजी प्रताप को मर्ज कर इस पत्रिका के प्रकाशन का वर्ष जनवरी 1905 मान्य करवाने में उन्होंने अथक प्रयास किये, जिसमें कामयाब भी रहे। वर्ष 1956 में नए मध्यप्रदेश के गठन के पश्चात मध्यप्रदेश संदेश का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। पूर्व में जयाजी प्रताप के नाम से निकलने वाली पत्रिका करीब 45 वर्ष के प्रकाशन के बाद जनवरी 1950 में ग्वालियर रियासत के मध्य भारत का अंग बनने के बाद भी नियमित रूप से प्रकाशित होती थी। उन दिनों इसका नाम मध्य भारत संदेश कर दिया गया था। मध्यप्रदेश संदेश का मूल प्रकाशन जयाजी प्रताप मान्य करवाने का कार्य आसान न था। इस तरह एक पत्रिका तीन नाम से जरूर निकली और 1905 से 2020 तक नियमित प्रकाशित हो रही है। इस तरह एक पत्रिका के माध्यम से जनसम्पर्क विभाग को एक विरासत से जोड़ने का सौभाग्य श्री जोशी के प्रयासों से मिला। 

समाज के दिव्यांग वर्ग के प्रति उनकी सहानुभूति सार्वजनिक रूप से दिखती थी। मुख्यमंत्री निवास हो या मंत्रालय, भीड़ में भी उन्हें हाथ में कागज लिये कोई दिव्यांग व्यक्ति अलग दिख जाता था, तो वे खुद आगे बढ़कर उसकी तकलीफ पूछते थे। साथ ही उसके कार्य के संबंध में समन्वय कर समाधान का प्रयास भी करते थे।  

प्रत्येक मनुष्य के कुछ निजी गुण और मौलिक प्रतिभा के आयाम होते हैं, जिससे मनुष्य की छवि अन्य लोगों से भिन्न होती है। इस विश्व में कोई मनुष्य सर्वगुण सम्पन्न नहीं हो सकता। लेकिन आम तौर पर लोकप्रियता के पैमाने पर मूल्यांकन के समय जो आधार मान्य होते हैं उनमें श्री जोशी बहुत खरे सिद्ध हुए और वरिष्ठ होते-होते वे एक मंझे हुए प्रशासक, आदर्श व्यक्ति और एक अनुकरणीय व्यक्तित्व के रूप में जाने गये। मध्यप्रदेश के प्रशासनिक अधिकारियों से भी उनके संबंध बहुत पारिवारिक किस्म के थे। लोक कल्याण और नवाचार में उनकी रूचि थी। मध्यप्रदेश में नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष और इसके पूर्व कलेक्टर छतरपुर, नगर निगम प्रशासक जबलपुर, कमिश्नर बस्तर, संचालक जनसम्पर्क, प्रबंध संचालक मध्यप्रदेश माध्यम, सचिव जनसम्पर्क, प्रमुख सचिव जनसम्पर्क और तकनीकी शिक्षा के रूप में कार्य किया। भोपाल से दिल्ली जाने के बाद वे नेशनल हाईवे अथॉरिटी में प्रशासनिक सदस्य रहे। इसके उपरांत जल संसाधन सचिव के रूप में केन्द्र सरकार में पदस्थ रहे। सचिव कार्मिक मंत्रालय से वे सेवानिवृत्त हुये। आज जब श्री जोशी हमारे बीच नहीं है तो हम सब उनकी स्मृतियों और आदर्शों का स्मरण कर रहे हैं। जनसम्पर्क विभाग के सभी अधिकारियों की भावना समाहित करते हुये मैं स्व. जोशी द्वारा स्थापित श्रेष्ठ परम्पराओं को अपने साथियों के साथ आत्मसात करने के संकल्प के साथ उन्हें आदरांजलि प्रस्तुत करता हूँ।

(लेखक सचिव जनसंपर्क, आयुक्त नगरीय प्रशासन एवं विकास मध्यप्रदेश शासन हैं)

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