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Wednesday, 21 August 2019

मंगल गीत गाकर पुत्र वती महिलाओं ने पूजा मॉ ललही छठ

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*पुत्रवती नारियों ने पूजा ललही छठ*

*मंगल गीत गाकर पुत्र वती महिलाओं ने पूजा मॉ ललही छठ

*💫लालापुर (प्रयागराज)* ललही छठ का पर्व सहरी क्षेत्रों की तुलना में कृषि समुदाय या ग्रामीण इलाको में इस पर्व का ज्यादा प्रचलन हैं,जिन महिला के पुत्र होते है ,वही महिलाये ललही छठ महारानी की ब्रत एवं पूजा करती है, पुरोहित एक स्थान पर ललही महारानी को हरे छिउल, बैर, गूलर,कास, कुशा, को बेदी बनाकर खड़ा कर देते है,कुछ महिलाएं रंगोली आदि से सजा देती है,सुबह जो महिला ब्रत रखती है,ओ महिला महुआ की दातून करती है,उसके बाद स्नान करके नया वस्त्र पहनकर  माँ ललही के पास पूजा करने के लिए जाती है, इनका पूजा का भी समय अलग है, जब हल बन्द होने का समय होता हैं तभी ललही महारानी की पूजा होती है।थाल में  मिट्टी का भुकुवा को रंग करके साथ मे,चीनी का भुकुवा में भुना हुआ चना ,धान, लावा,फसही धान का लावा,किसमिस आदि भरकर माँ के चरणों में एक साथ महिलाएं समर्पित करती है,साथ में मंगल गीत गाती हुई माँ ललही की परिक्रमा करती हैं।उसके बाद सब महिला एक साथ बैठकर भगवान बलराम की कथा सुनती है।पूरा दिन ब्रत रखती है,साम को महुआ, भैष का दूध,व दही,जिस भैष के बच्चा पड़वा होगा उसी भैष का दूध पूजा में स्तेमाल होगा,और वही दूध दही के साथ जो महिला ब्रत रखती है, उसी दूध दही को सेवन करेगी।धर्म शास्त्र के अनुसार बताया जाता है, कि महाभारत में देवी उत्तरा ने अपने नर बच्चों के कल्याण के लिए भगवान कृष्ण से सलाह ली थी,और अपने नष्ट गर्भ को ठीक करने के लिए हरछठ,ललही छठ ब्रत रखकर पूजा की थी उसी समय से हिन्दू धर्म में ललही छठ पूरे भारत वर्ष में मनाया जाने लगा।

 *✍पी सी पाण्डेय की रिपोर्ट*

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