*बिहार के अन्तर्राष्ट्रीय ज्ञान स्थल बोधगया में महाबोधीमंदिर के बोधीवृक्ष छाव में त्रिपिटक सूत्रपाठ सुना है कि बुद्ध ने आत्मा को बताया था मिथ्या धारणा: भिक्षु कस्सप।* रिपोर्टः दिनेश कुमार पंडित पत्रकार । बिहार के अन्तर्राष्ट्रीय ज्ञान स्थल बोधगया के महाबोधीमंदिर के छाव में त्रिपिटक सूत्रपाठ पढ़ रहेबौद्ध भिक्षु थे कि बुद्ध कहते हैं कि आत्मा की धारणा वैयक्तिक अमरता हेतु मानव की सूक्ष्मतम व - BHARAT NEWS LIVE 24

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Thursday, 6 December 2018

*बिहार के अन्तर्राष्ट्रीय ज्ञान स्थल बोधगया में महाबोधीमंदिर के बोधीवृक्ष छाव में त्रिपिटक सूत्रपाठ सुना है कि बुद्ध ने आत्मा को बताया था मिथ्या धारणा: भिक्षु कस्सप।* रिपोर्टः दिनेश कुमार पंडित पत्रकार । बिहार के अन्तर्राष्ट्रीय ज्ञान स्थल बोधगया के महाबोधीमंदिर के छाव में त्रिपिटक सूत्रपाठ पढ़ रहेबौद्ध भिक्षु थे कि बुद्ध कहते हैं कि आत्मा की धारणा वैयक्तिक अमरता हेतु मानव की सूक्ष्मतम व

*बिहार के अन्तर्राष्ट्रीय ज्ञान स्थल  बोधगया में  महाबोधीमंदिर के बोधीवृक्ष छाव में त्रिपिटक सूत्रपाठ सुना है कि  बुद्ध ने आत्मा को बताया था मिथ्या धारणा: भिक्षु कस्सप।*
रिपोर्टः
दिनेश कुमार पंडित
पत्रकार ।
बिहार के अन्तर्राष्ट्रीय ज्ञान स्थल बोधगया के महाबोधीमंदिर के छाव में त्रिपिटक सूत्रपाठ पढ़ रहेबौद्ध भिक्षु  थे कि बुद्ध कहते हैं कि आत्मा की धारणा वैयक्तिक अमरता हेतु मानव की सूक्ष्मतम व बद्धमूल कामना के मूल में निहित रहती है जो उसे अपने में एक स्थाई आनंदमय तत्व को मानने के लिये बाध्य करती है। एक शाश्वत आनंदमय आत्मा में आस्था रखने के कारण मनुष्य वास्तविक दृष्टि से वंचित रह जाता है और भव परंपरा में पड़ा हुआ दुख भोगता रहता है। मनुष्य इस जगत में सर्वत्र आनंद ढ़ूंढता रहता है। सुख की यही चाह, वासना, कामना अथवा तृष्णा उसे अपने व्यक्तित्व में किसी नित्य आनंदमय तत्व की कल्पना के लिये प्रेरित करती है। 14वें त्रिपिटक के पांचवें दिन संध्या में प्रवचन के दौरान उक्त बातें भिक्षु कस्सप ने कही। उन्होंने बुद्ध की शिक्षा के आधार पर बताया कि उस काल्पनिक तत्व अर्थात आत्मा के प्रति उसमें मोह का आसक्ति हो जाता है जिसे बुद्ध आत्मवादुपादान कहते हैं। इस आसक्ति की ओर ले जाने वाली यह मिथ्या धारणा सत्काय दृष्टि कहलाती है। बुद्ध कहते हैं कि अहं की इस धारणा से अत्यंत प्रगाढ़ रूप से चिपकने के कारण हम अकुशल कर्मों का संपादन करने लगते हैं।चित्त कलुषित रहता है और हम अंधकार में भटकते रहते हैं। सत्य से दूर चले जाते हैं। आत्मा संबंधी इस मिथ्या धारणा से मुक्ति दिलाने के लिये हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व का विश्लेषण कर यह दिखाते हैं कि हमारा व्यक्तित्व रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार व विज्ञान जैसे पंच उपादान स्कंधों के अतिरिक्त कुछ नहीं है। बुद्ध ने अनेक उपमाओं, रूपकों, दृष्टांतों व युक्तियों द्वारा यह समझाने का प्रयास किया है कि यह मेरा है, यह मैं हूं, यह मेरी आत्मा है, सोचना नितांत मूर्खता है। जो आत्मा विषयक मिथ्या धारणाओं में नहीं फंसता वह अंधकार के पार हो जाता है।निर्वाण को प्राप्त करता है। इसीलिये बुद्ध सर्वत्र अनासक्ति की शिक्षा देते दिखते हैं। जब बुद्ध अत्ता ही अत्तनो नाथो या अत्त दीप वहिरथ कहते हैं, तो यहां पुरुषार्थ, स्वावलंबन और सेल्फ रिलांयस बताते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। इसीलिये बुद्ध कर्म सिद्धांत की अपरिहार्यता को स्वीकार करते हैं। व्यक्ति अपने प्रयास से निर्वाण प्राप्त कर सकता है। कुशल चित्त की साधना द्वारा मनुष्य वासनाओं को धो देता है। तृष्णा को दूर करता है। जब चित्त निर्मल होता है,तभी सम्यक ज्ञान की उत्पत्ति होती है।

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