कांटों से भरा होगा पक्ष एवं विपक्ष ओं के लिए वर्ष 2019 l झारखंड/बिहार से नूतन मिश्रा का राजनीतिक विश्लेषण राजनीति विश्लेषण l जैसे-जैसे वर्ष 2019 आम चुनाव का समय आ रहा है वैसे वैसे आम लोगों के तरह-तरह की चर्चाएं होने लगा है l यदि चुनाव और घोषणाओं की बात करें तो किसी भी पार्टी नेता चुनाव के दौरान बड़े-बड़े विकास के दावे करते नहीं थकते l चुनाव की समाप्ति होते हैं विकास की दावे छलावा सा - BHARAT NEWS LIVE 24

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Thursday, 6 December 2018

कांटों से भरा होगा पक्ष एवं विपक्ष ओं के लिए वर्ष 2019 l झारखंड/बिहार से नूतन मिश्रा का राजनीतिक विश्लेषण राजनीति विश्लेषण l जैसे-जैसे वर्ष 2019 आम चुनाव का समय आ रहा है वैसे वैसे आम लोगों के तरह-तरह की चर्चाएं होने लगा है l यदि चुनाव और घोषणाओं की बात करें तो किसी भी पार्टी नेता चुनाव के दौरान बड़े-बड़े विकास के दावे करते नहीं थकते l चुनाव की समाप्ति होते हैं विकास की दावे छलावा सा

कांटों से भरा होगा पक्ष एवं विपक्ष ओं के लिए वर्ष 2019 l झारखंड/बिहार से नूतन मिश्रा का राजनीतिक विश्लेषण राजनीति विश्लेषण l जैसे-जैसे वर्ष 2019 आम चुनाव का समय आ रहा है वैसे वैसे आम लोगों के तरह-तरह की चर्चाएं होने लगा है l यदि चुनाव और घोषणाओं की बात करें तो किसी भी पार्टी नेता चुनाव के दौरान बड़े-बड़े विकास के दावे करते नहीं थकते l चुनाव की समाप्ति होते हैं विकास की दावे छलावा साबित ही देखने को मिलता है l चाहे पक्ष हो या विपक्ष सभी की भूमिका देखने को मिला है l बताते चलें कि वर्ष 2019 पक्ष एवं विपक्ष ओं के लिए  कांटो भरा रहेगा l जिस प्रकार से सत्ता रूट और विरोधी दलों ने कमर कसनी शुरू कर दी है भाजपा के अध्यक्ष हर प्रदेश का दौरा कर रहे हैं और विरोधी नेता गण भी किसी न किसी बहाने एक दूसरे से मिल रहे हैं अभी तो किसी को भी विश्वास नहीं आएगी वह आसानी से सरकार बना लेंगे पहला सवाल तो यह है कि क्या समस्त विधान सभा ओं और लोकसभा के चुनाव एक साथ होंगे यदि यह सारे चुनाव एक साथ होंगे तो कब होंगे क्या मध्य प्रदेश राजस्थान छत्तीसगढ़ और मिजोरम के चुनाव के साथ साथ लोकसभा और शेष सभी राज्यों के चुनाव दिसंबर 2018 में ही करवा दिए जाएंगे या लोकसभा के चुनाव के साथ मई 2019 में करवाए जाएंगे सरकार की मंशा तो यह लग रही है कि यह चुनाव एक साथ करवाए जाएं उनके तारीखें आगे पीछे की जा सकती है लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव यदि साथ साथ होते हैं तो यह एक उत्तम परंपरा का प्रारंभ होगा यदि कांग्रेस की साल भर पुरानी पंजाब सरकार को चुनाव का सामना करना पड़ेगा तो भाजपा के उत्तर प्रदेश समेत कई सरकारों को अपनी 5 साल की अवधि को तिलांजलिदेनी पड़ेगीl विरोधी दलों को डर है कि दोनों चुनाव साथ साथ होंगे तो भाजपा को इसका तगड़ा लाभ मिल जाएगा क्योंकि केंद्र और ज्यादातर राज्यों में वहीं सत्तारूढ़ है इस तर्क में कुछ दर्द जरूर हैं लेकिन वह या ना भूलने की 2014 की मोदी लहर आधारित है और भ्रष्टाचार की कालिख पोतने के लिए कांग्रेसी सरकार का चेहरा भी उपलब्ध नहीं है राज्यों के चुनाव तो वहां की सरकारों के कामकाज के आधार पर जीते जाते हैं लेकिन सारे चुनाव साथ साथ होते हैं तो प्रांतीय मतदाताओं पर सभी दलों के केंद्रीय नेताओं और सरकार का असर ज्यादा होने की संभावना रहेगी ऐसी स्थिति में भाजपा का भविष्य नरेंद्र मोदी के हाथों में होगा किंतु 2014 के नरेंद्र मोदी और 2018 के नरेंद्र मोदी में क्या जमीन आसमान का अंतर नहीं आ गया है मोदी की सफलता का क्या भाजपा के मुख्यमंत्रियों को भुगतना पड़ेगा मोदी का तरीका है उसके लिए हो सकते हैं इसलिए उन्हें लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथी हो जाना चाहिए l लेकिन आज विपक्ष की हालत खस्ता है l विपक्ष के सारे पक्षी अपने अपने  पिंजरे में बंद हैl
उनमें कोई शेर नहीं है जिस की दहाड़ सारा देश सुने इन्हें आपस में जोड़ने वाला को सिद्धांत कोई आदर्श कोई नीति और कार्यक्रम भी नहीं है विपक्ष के पास एक ऐसी सदी के भारत का कोई विश्लेषण सपना भी नहीं है इसके बावजूद अगर वे एकजुट हो जाते हैं तो वे भाजपा की नया आसानी आसानी से डूबा सकते हैं क्योंकि 2014 के चुनाव में भाजपा को कुल 31% वोट मिले थे वह भी लहर के कारण जो अब लौट चुकी है यह हमने विपक्ष की एकता का नमूना उत्तर प्रदेश में देख लिया समाजवादी और बहुजन पार्टियों ने मिलकर उपचुनाव में चारों सीटें जीत ली जिनमें से एक मुख्यमंत्री एक उपमुख्यमंत्री की थी यदि सिर्फ उत्तर प्रदेश और अन्य हिंदी राज्यों में विरोधी एक हो जाए तो भाजपा की 50 से 60 तक कम हो सकती है यदि कर्नाटक में कांग्रेस और सेकुलर मिलकर लड़की हो तो क्या भाजपा को कितनी सीटें मिलती है गुजरात में ही जान बची तो लाखों पाए यह तो साफ साफ दिखाई पड़ा है कि अगले चुनाव में भाजपा भेजो उसके साथ गठबंधन में है वह भी अपना ठिकाना तलाशने में जुटी हुई है शिवसेना में तोता की घोषणा कर रखी है नीतीश का भरोसा नहीं विलास पासवान ओमप्रकाश राजभर और अकाली दल आदि भी भाजपा के साथ रहेंगे या नहीं कुछ पता नहीं नेट बंद होने वाले छोटे-छोटे दलों से प्रेरित होते हैं यदि उन्हें मोदी की ऐसी हालत में भाजपा आएगी सवाल उठेगा संभव है कि भाजपा के नेता के साथ होना चाहिए लेकिन भाजपा की सबसे बड़ी है जमाने में भी एक अखिल भारतीय पार्टी है और उसके पास कोई नेता नहीं राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष हैं उन्होंने अपने आप को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार भी घोषित कर रखा है यदि वे इसी टेक पर पड़े रहते हैं तो अन्य दल कांग्रेस के साथ संयुक्त मोर्चा नहीं बनाएंगे कांग्रेस की स्थिति सारे देश में वैसे ही हो सकती है जैसे उत्तर प्रदेश में हुई है यदि राहुल अपनी मां के नक्शे कदम पर चले और प्रधानमंत्री पद की इच्छा भी न करें तो देश में एक जनाधार दूसरा मोर्चा खड़ा किया जा सकता है विपक्ष का प्रधानमंत्री कौन होगा इसका फैसला चुनाव के बाद भी हो सकता है 1977 में भी यही हुआ था दूसरा मोर्चा खड़ा करने में नेतृत्व की यह बाधा दूर हो जाए तो भी कई समस्याएं सामने आ सकती है पश्चिम बंगाल में कांग्रेस तृणमूल और मार्क्सवादी तथा केरल में कांग्रेस और मार्क्सवादी अपने मतभेदों को कैसे पटेगी दिल्ली में क्या आप और कांग्रेस हाथ मिला लेगी मायावती और अखिलेश तब तक रह पाएंगे आपस में सीटों का बंटवारा क्या शांतिपूर्वक कर पाएंगे यदि नरेंद्र मोदी ने कुछ चमत्कारी कदम नहीं उठाए तो वर्ष 2019 में विपक्षी गठबंधन की सरकार निश्चित है लेकिन यह भी सुनिश्चित है कि वह सरकार वर्ष 1977 की मोरारजी और चरण सिंह की सरकारें की तरह वर्ष 1989 की विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर की सरकारों की तरह और वर्ष 1996 में देवगौड़ा और गुजराल की सरकारों की तरह अल्प जीबी होगी और आपसी खींचतान के कारण उसकी जान हमेशा अधर में लटकी रहेगी पांचवी पास के साथ भारत वासियों के लिए आने वाला समय काफी कांटो भरा होगा l देखना दिलचस्प होगा कि पक्ष एवं विपक्ष के नेता आम जनता को वर्ष 2019 के चुनाव में अपने पक्ष में किस रूप में कामयाबी प्राप्त कर सकते हैं l

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